Skip to main content
कुछ ज़्यादा फ़र्क नहीं है,
घड़ी और समन्दर में।
घड़ी के वक़्त जैसे ऊपर नीचे होती रहती है,
वो लहरें भी समन्दर में।
मैं कश्ती का वो मुसाफ़िर नहीं,
जिसे किनारे की उम्मीद हो।
ए ज़िन्दगी जहां तू उतारेगी मैं उतरूं वहीं ,
और उसी किनारे को मंज़िल मानकर उसकी दीद हो।
आज़मा कर उस ख़तरे की घंटी जैसी लहर,
आती हुए हमारी तरफ़ उड़के।
कोई फिसल गया नीचे, किसी के लिए थी वो कहर,
कोई ख़ुद को बचा रहा ,कोई रहा अपना मोबाइल पकड़के।
आया मेरे ज़हन में उसी वक़्त ये ख़्याल,
ज़िन्दगी, दिन, वक़्त सब जुड़े हैं समन्दर, कश्ती, लहरों से।
लहरें उठने से होती है डूबती कश्ती के सवारों जैसी हाल,
लहरें बराबरी में हो तो ज़िन्दगी भर जाती है हसीन पहरों से।